कवि: संत कबीरदास
भाषा: सधुक्कड़ी / पंचमेल खिचड़ी
सारांश: 'साखी' (साक्षी या गवाह) कबीरदास जी के नीतिपरक और आध्यात्मिक दोहे हैं। इन
साखियों के माध्यम से कबीर ने गुरु की महिमा, ईश्वर की सर्वव्यापकता, और बाहरी आडंबरों (जैसे मूर्ति पूजा,
दिखावा) का विरोध किया है। उन्होंने मनुष्य को सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने का संदेश दिया है।
शब्दार्थ: दोऊ = दोनों; काके = किसके; पाँय = पैर; बलिहारी = न्योछावर होना (समर्पित होना)।
प्रसंग: इस दोहे में कबीरदास जी ने गुरु का स्थान ईश्वर (गोबिंद) से भी ऊँचा बताया है।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि मेरे सामने गुरु और ईश्वर दोनों एक साथ खड़े हैं। अब मैं दुविधा में हूँ कि पहले किसके चरण स्पर्श करूँ? अंत में कबीर कहते हैं कि मुझे पहले अपने गुरु के चरणों में ही शीश झुकाना चाहिए और उन पर बलिहारी जाना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही मुझे वह ज्ञान दिया है जिससे मैं ईश्वर (गोबिंद) तक पहुँच पाया हूँ। अतः गुरु का स्थान ईश्वर से भी महान है।
शब्दार्थ: मैं = अहंकार (Ego); हरि = ईश्वर; साँकरी = संकरी/पतली; तामें = उसमें; समाहिं = समा सकते/रह सकते।
प्रसंग: अहंकार और ईश्वर कभी भी एक साथ नहीं रह सकते।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे मन में 'मैं' अर्थात् अहंकार का वास था, तब तक मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई थी। अब मुझे ईश्वर (हरि) के दर्शन हो गए हैं, तो मेरा सारा अहंकार नष्ट हो गया है। प्रेम (ईश्वर की भक्ति) की गली इतनी संकरी (पतली) है कि इसमें अहंकार और ईश्वर दोनों एक साथ नहीं रह सकते। जहाँ अहंकार है वहाँ ईश्वर नहीं, और जहाँ ईश्वर हैं वहाँ अहंकार टिक नहीं सकता।
शब्दार्थ: कांकर-पाथर = कंकड़-पत्थर; जोरि कै = जोड़कर; ता चढ़ि = उस पर चढ़कर; बांग दे = अज़ान देना।
प्रसंग: इस दोहे में कबीर ने दिखावे की भक्ति और शोर-शराबे का विरोध किया है।
भावार्थ: कबीरदास जी मुसलमानों के धर्मिक आडंबरों पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि तुमने कंकड़-पत्थर जोड़कर मस्जिद का निर्माण तो कर लिया, और अब उस मस्जिद की ऊँची मीनार पर चढ़कर मुल्ला ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर (अज़ान देकर) खुदा को पुकारता है। कबीर पूछते हैं कि क्या तुम्हारा खुदा (ईश्वर) बहरा हो गया है? जो ईश्वर चींटी के पैरों की आवाज़ भी सुन लेता है, उसे पुकारने के लिए इस तरह चिल्लाने की क्या आवश्यकता है? ईश्वर तो शांत मन से की गई प्रार्थना भी सुन लेता है।
शब्दार्थ: पाहन = पत्थर; पूजे = पूजने से; पहार = पहाड़; ताते = उससे (उस पत्थर की मूर्ति से); चाकी = चक्की।
प्रसंग: कबीरदास जी ने हिन्दुओं की मूर्ति पूजा पर करारा व्यंग्य किया है।
भावार्थ: कबीरदास जी कहते हैं कि यदि केवल पत्थर पूजने से ईश्वर (हरि) मिल जाते हैं, तो मैं किसी छोटे पत्थर को क्यों पूजूं? मैं तो पूरे पहाड़ की पूजा करूँगा ताकि मुझे ईश्वर जल्दी मिल जाएँ। कबीर समझाते हैं कि इन निर्जीव पत्थर की मूर्तियों की पूजा करने से तो वह पत्थर की चक्की भली है, जिसके द्वारा पीसा गया अनाज खाकर सारा संसार अपना पेट भरता है। कबीर का उद्देश्य यह बताना है कि ईश्वर पत्थर की मूर्तियों में नहीं, बल्कि मन की सच्ची श्रद्धा में बसता है।
शब्दार्थ: समंद = समुद्र; मसि = स्याही (Ink); लेखनि = कलम (Pen); बनराय = जंगल के पेड़-पौधे; कागद = कागज़; हरि गुन = ईश्वर के गुण/महिमा।
प्रसंग: इस दोहे में कबीरदास जी ने ईश्वर की अनंत महिमा और कृपा का वर्णन किया है।
भावार्थ: कबीरदास जी ईश्वर की विशालता का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यदि मैं संसार के सातों समुद्रों के पानी को स्याही (Ink) बना दूँ, दुनिया के सभी जंगलों के पेड़ों की लकड़ियों से कलम (Pen) बना लूँ, और इस पूरी पृथ्वी को एक विशाल कागज़ मान लूँ, तब भी मैं ईश्वर के अनंत गुणों को लिख कर पूरा नहीं कर सकता। ईश्वर की महिमा इतनी महान और असीम है कि उसे शब्दों में बाँधा ही नहीं जा सकता।